Biography of Shoaib Akhtar: शोएब अख्तर की जीवनी

अपने हुनर के आगे दुनिया को झुकाने वाले लोग बहुत कम हुए हैं। यह लोग कुछ ऐसी जगहाओ से निकलकर आए जहां ना तो इनके पास खास सुख सुविधा थी और न ही बेहतर जीवन जीने के साधन। इनका जीवन किसी संघर्ष से काम नहीं था। इसी संघर्ष ने इन्हे उन मुश्किलों का सामना करने की हिम्मत दी और फिर इसी संघर्ष की बदौलत यह लोग आगे बढ़ते रहे। इन्हीं सफल लोगों में से एक नाम है क्रिकेट के तेज गेंदबाज शोएब अख्तर का। जिन्हे रावलपिंडी एक्सप्रेस के नाम से भी जाना जाता है। हालांकि उनको यह सफलता इतनी आसानी से नहीं मिली। उनकी इस सफलता के पीछे उनका बहुत बड़ा संघर्ष है। तो चलिए आज उनके जीवन के बारे में बात करते है।

शोएब अख्तर का जन्म 13 अगस्त 1975 को पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर में हुआ। उनके पिता अटोक ऑयल रिफाइनरी में एक प्लांट ऑपरेटर थे। शोएब अपने माता पिता की पांचवी संतान है। उनसे ठीक बड़े यानी चौथे नंबर के भाई का नाम भी शोएब था। परंतु दो साल का होने से ठीक पहले ही एक बीमारी के कारण उनकी मौत हो गई। शोएब की मां को यह नाम बहुत पसंद था इसलिए जब वो पैदा हुए तो उनका नाम भी शोएब रख दिया गया। शोएब बचपन में ठीक से चल पाने में बी असमर्थ थे क्योंकि उन्हें हड्डियो से संबंधित एक गंभीर बीमारी थी। और इसके इलावा उनके पैर के तलवे भी काफी फ्लेट थे। इस वजह से शुरुआत में चलना तो दूर वो ठीक से खड़े भी नही हो पाते थे। करीब छे साल तक उन्हे चलने फिरने में बहुत दिकत आती थी। डॉक्टर्स के अनुसार इस बीमारी के शिकार लोग कभी स्पोर्ट्समैन नही बन सकते क्योंकि इस बीमारी में भागना तो दूर चलना भी बड़ी मुश्किल से हो पाता है। इसी दौरान साल की उमर में उन्हे काली खासी की बीमारी भी हो गई थी। कई लोग कह चुके थे की यह लड़का कभी ठीक नही होगा लेकिन शोएब की मां ने कभी हिम्मत नहीं हारी और शोएब जब इस बीमारी से मुक्त हुए तो वो चलने की बजाए सीधे दौड़ने लगे।

शोएब के एक इंटरव्यू में ये भी बताया था कि उनका तालुक एक गरीब परिवार से है। उनके माता पिता और चार बच्चों को फैमिली एक कमरे के आधे कच्चे मकान में रहा करती थी। और एक बार तेज बारिश के कारण घर की छत  गिर गई थी पूरी रात परिवार ने किसी तरह बारिश में खुद को बचाया था और अगले दिन सभी ने मिल कर छत की मुरम्मत की थी। और जब उन्होंने क्रिकेट अकाडमी ज्वाइन की तब उनके पास एकेडमी तक जाने के लिए भी पैसे नही होते थे और वो भागते हुए वहां पहुंचा करते थे। एक किस्सा याद करते हुए शोएब ने बताया था कि जब वह पिंडी क्लब में रोजाना प्रैक्टिस के लिए जाया करते थे और लोटते वक्त रास्ते में एक गन्ने के जूस वाला होता था। शोएब को गन्ने का जूस बहुत ही पसंद था। पर उनके पास इतने पैसे नही होते थे की वे रोज जूस खरीद कर पी सके तो उन्होंने उससे कहा भाई जान आप मेरे मित्र बन जाओ और मुझे रोजाना गन्ने का जूस पिलाया करो। और जब मैं एक दिन स्टार बन जाऊंगा तब में आपको गन्ने की मशीन खरीद कर दूंगा। धीरे धीरे उनकी उससे दोस्ती हो गई और उसने शोएब को एक दिन पूछा तुम सच मच स्टार बन जाओगे ना। तब शोएब ने उससे कहा तुम मेरी आंखों में वो आग देख सकते हो। उसने शोएब को डेढ़ साल तक गन्ने का मुफ्त जूस पिलाया और जब वह स्टार बन कर लोटे और उससे मिलने उसकी दुकान पर गए तो वह उन्हें नही मिला। बाद में पता चला की उसकी डेथ हो चुकी है। इसका शोएब को बहुत दुख हुआ। फिर वह उसके घर गए और उसके घर वालो से मिले और उन्हे एक नई दुकान बनवाकर दी।

शोएब अख्तर ने इंटरनेशनल क्रिकेट में अपना डेब्यू टेस्ट नवंबर 1997 में वेस्ट इंडीज के ओपनिंग फास्ट बोलर के तौर पै किया। उस समय उनकी उमर केवल 22 साल की थी और उनकी आग उगलती तेज गेंदोंं ने वेस्ट इंडीज टीम की हालत खराब कर दी थी। और क्रिकेट की दुनिया को एक चमकता सितारा मिल गया था। मार्च 1998 में जिम्बावे के खिलाफ उन्होंने इंटरनेशनल एकदिवसीय क्रिकेट में अपना डेब्यू किया। उसके बाद शोएब ने पीछे मुड़कर नही देखा। शोएब की गेंदबाजिको देखने के बाद न्युजीलैंड के उस समय के कोच रहे जॉन राइट ने कहा था कि यह लड़का बहुत जल्द क्रिकेट की दुनिया में अपना नाम और मुकाम बना लेगा और एसा ही हुआ। दुनिया के लिए उनका क्रिकेटर बनना और क्रिकेट के इतिहास की सबसे तेज गेंद फेंकना शायद एक कुदरत का करिश्मा ही है पर शोएब को हमेशा खुद पर यकीन था कि एक दिन वो ऐसा जरूर कर लेंगे। सच में उनका जनून ही था जो इतनी जटिल बीमारी को भी मात देकर उन्होंने अपने खाब को पूरा किया। और क्रिकेट की दुनिया में ऐसा बोलर बन कर उबरा जिसने रफ्तार की जंग में सब को पीछे छोड़ दिया।

समय के साथ साथ शोएब ने अपनी बोलिंग के सत्र को ओर भी ऊंचा कर दिया और जल्दी ही उनकी तेज रफ्तार बाउंसर और यॉर्कर के सामने बड़े बड़े बालेबाज धाराशाही होने लगे। एक जमाने में तेज गेंदबाज बिना हेलमेट की आने वाले बालेबाज़ को निशाना बनाते थे पर शोएब ने तो हेलमेट पहने बालेबाजो के चेहरे भी खून में लथपथ कर दिए। 1999 के वर्ल्ड कप में पाकिस्तान को फाइनल में पहुंचाने में शोएब का भी बड़ा योगदान रहा था। उन्होंने 10 इनिंग्स में 2443 की एवरेज में 16 विकेट चटकाए और पाकिस्तान को फाइनल खेलने का मोका दिलाया। शोएब अख्तर ने 2003 के वर्ल्ड कप के ग्रुप मैच में इंग्लैंड के खिलाफ 161.3 की.मी. प्रति घंटे की रफ्तार से गेंद फेंकी। दोस्तो यह क्रिकेट इतिहास में पहले ऐसे बोलर है जिन्होंने 100 मील प्रति घंटे की रफ्तार से गेंद फेंकी है।

शोएब का विवादो में भी हमेशा नाम जुड़ा रहा और इस हरकतों की वजह से उन्हें कई बार टीम में निकाला भी गया, पर उन्होंने हर बार अपने खेल से आलोचकों का मुंह बंद किया और टीम में जगह बनाते रहे। इंजरी और कंट्रोवर्सी से भरे अपने क्रिकेट करियर को उन्होंने 2011 में खतम करने की घोषणा की और 8 मार्च 2011 को इस शानदार गेंदबाज ने क्रिकेट से सन्यास ले लिया। उन्हे इस बात का हमेशा अफसोस रहा की वो विश्व कप 2011 के सेमीफाइनल में, जो की भारत के साथ था वो नहीं खेल पाए। उनका सपना था की वो अपने आखिरी मैच में इतनी तेज गेंद फेंके जो की उन्होंने कभी भी न फेंकी हो पर ये हो न सका। उन्होंने अपने इंटरनेशनल करियर में 46 टेस्ट मैच में 178 विकेट और 163 एकदिवसीय मैचों में 247 विकेट अपने खाते में डाले। इसमें टेस्ट मैचों में 1 पारी में 11 रन देकर 6 विकेट और एकदिवसीय मैचों में 16 रन देकर 6 विकेट उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा।

यह तो सभी मानते है की शोएब अख्तर बल्लेबाजों के लिए मैदान में किसी आतंक से कम नहीं थे उनके सन्यास की घोषणा से यकीनन काफी बल्लेबाजों ने सकून की सांस ली होगी। शोएब आज भी मानते है की उनके जितना तेज गेंद कभी भी कोई नहीं फैंक सकता और यह काफी हद तक सच भी है क्योंकि उनके द्वारा फेंकी गई 161.3 की.मी. प्रति घंटे की रफ्तार को अभी तक किसी ने नहीं तोड़ा है।

 

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